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Holi पर हावी ना हो पाया बाजारवाद, शराब से रंग में भंग : Dr Raghavendra Sharma

डॉक्टर राघवेंद्र शर्मा
सर्वाधिक उमंग, सर्वाधिक आनंद और सर्वाधिक प्रेम का त्यौहार होली उत्सव हमारे सामने है। इसे सर्वाधिक उमंग आनंद और प्रेम का त्यौहार इसलिए कहा गया है, क्योंकि वर्ष में पड़ने वाले प्रमुख त्योहारों की गिनती करें तो हम पाते हैं कि दीपावली भले ही त्योहार का सर्वोत्तम स्वरूप कहा जाता हो, लेकिन वह ऐश्वर्य वैभव और धन संपदा का त्यौहार बन गया है। रक्षाबंधन की बात करें तो इसे ज्ञान के अभाव में हमने स्वयं भाई और बहन तक सीमित कर दिया है। कहीं-कहीं ग्रामीण परिवेश में जरूर ससुराल से मायके आने वाली बेटियां अपने माता-पिता और उनके  समकक्ष बुजुर्गों को अभी भी रक्षा सूत्र बांधती देखी जाती हैं । जबकि हमारे धार्मिक ग्रंथ बताते हैं कि रक्षाबंधन वह त्यौहार है जिसके माध्यम से एक आम व्यक्ति भी अपने से सबल व्यक्ति को रक्षा सूत्र बांधकर अपने लिए अभय दान मांग लिया करता था। वहीं रक्षा सूत्र ग्रहण करने वाला व्यक्ति बांधने वाले की रक्षा के लिए स्वस्फूर्त होकर जवाब देह हो जाया करता था। और भी अन्य ढेर सारे त्योहार सनातन धर्मावलंबियों के जीवन में कम महत्व नहीं रखते। लेकिन वर्ष भर में पढ़ने वाले तीन त्योहारों होली, दीपावली और रक्षाबंधन को प्रमुख श्रेणी में रखा जाता है। इनमें से होली एकमात्र ऐसा त्यौहार है जो किसी रिश्ते नाते की वांछना नहीं करता और ना ही परवाह। यह त्यौहार केवल इतना संकेत देता है कि यदि तुम्हारे द्वारा रंग गुलाल लगाने से किसी को असीम आनंद की अनुभूति होती है, तो फिर तुम्हें आगे बढ़कर इस कर्तव्य का पूरे आनंद के साथ निर्वहन कर देना चाहिए। विद्वान तो यहां तक कहते हैं कि होली एकमात्र ऐसा त्यौहार है जो शत्रुताओं को भुलाने, भेदभाव की गहरी खाइयों को पाटने और ऊंच नीच की दीवारों को गिरा देने की शक्ति अपने आप में समाए हुए है। इसे मनाते वक्त यह नहीं देखा जाता कि हम समूह में जिसे रंग अथवा गुलाल लगा रहे हैं, वह हमारा शत्रु है या मित्र। यदि इस त्यौहार को नियमों कायदों की दृष्टि से देखें तो ऐसी किसी भी विशेष मर्यादा में इसे नहीं बांधा गया है। यदि कोई नियम कायदों की बात करे तो इसका केवल एक ही नियम है और एक ही कायदा है। वह यह कि इस रंग-बिरंगे त्यौहार में यदि किसी के नीरस और बेरंग जीवन में आनंद का रस घोलने, उमंगों के रंग दमकाने का अवसर तुम्हारे हाथ आ गया है तो उससे चूको मत। अपना सर्वस्व न्योछावर करके वह सब कर गुजरो जिसकी अपेक्षा हमसे मानवीयता करती है। पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित कुछ स्वयंभू विद्वानों ने लंबे अर्से से होली को हुड़दंग और पानी की बर्बादी करने का त्यौहार प्रतिपादित करने का बीड़ा उठा रखा है। जिस प्रकार इन्हें दीपावली के पावन अवसर पर पर्यावरण को बचाने और प्रदूषण से बचने के दौरे पड़ने लगते हैं। वैसे ही होली के आते ही अचानक इन लोगों को केवल एक दिन में ही दुनियाभर का सारा पानी बचाने की चिंता सताने लगती है। खेद की बात यह है कि जो सामाजिक पुरोधा वर्ग है, वह भी ऐसी सनातन विरोधी कुचालों का तीव्र प्रतिरोध नहीं करता। इसका कारण भी स्पष्ट है। वह यह कि होली एकमात्र ऐसा त्यौहार है जिसमें धन संपदा और महंगे संसाधनों की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस त्यौहार को मनाने के लिए चुटकी भर रंग गुलाल के साथ प्रेम प्यार से परिपूर्ण हृदय ही आवश्यक संसाधन माने गए। जाहिर है यह त्यौहार बाजारवाद की अपेक्षाओं पर खरा साबित नहीं होता। जैसे - दिवाली पर लोग कपड़े गहने वाहन, संपत्ति, ऐश्वर्य और विलासिता की अत्यंत महंगी खरीदी करते हैं। रक्षाबंधन पर भी बहन बेटियों को उपहार देने के लिए खरीदारी तो होती ही है। लेकिन होली में ऐसा नहीं है। आपके पास जैसे भी कपड़े उपलब्ध हैं, कोई चिंता की बात नहीं । पैरों में जूते चप्पल है तो ठीक और नहीं भी हैं तो कोई आवश्यकता नहीं। बस चुटकी भर रंग गुलाल लिया और मन गया होली का त्यौहार। हालांकि बहुत सुनियोजित  तरीके से इस त्यौहार को भी महंगा और दिखावटी बनाने के प्रयास हुए हैं। जैसा कि फिल्मों में दिखाया जाता है, अभिनेता अभिनेत्री और उनके सहयोगी कलाकार झकाझक सफेद कपड़ो में दमकते हुए कैमरे के सामने आते हैं और फिर यह साबित करने में लग जाते हैं कि होली खेलने का असली मजा तो नए चमचमाते सफेद कपड़े पहन कर ही आता है। हालांकि बेहद सीमित धनाढ्य वर्ग इस दिखावे की चपेट में आंशिक रूप से आ भी गया है। जिन्हें ईश्वर ने सर्व साधन संपन्न बनाया है, वह लोग होली जैसे रंग-बिरंगे त्यौहार के दिन भी झकाझक सफेद कपड़े पहनकर अपने चाहने वालों से मिलने निकलते हैं और अप्रत्यक्ष रूप से इस बात के लिए प्रेरणा के स्रोत बनते हैं कि अन्य लोगों को भी इस ऐश्वर्य वैभव पूर्ण होली का अनुसरण करना चाहिए।
 लेकिन खुशी की बात है कि व्यापक हिंदू समाज में अभी भी जो उपलब्ध है, जैसा उपलब्ध है, अधिकांश: उसी अवस्था में होली मनाने की परंपरा विद्यमान बनी हुई है। शुरुआत में इस त्यौहार के दौरान भांग की ठंडाई जैसे हल्के-फुल्के पेय पदार्थों के सेवन का चलन बना रहा। कुछ लोग आज भी भांग की ठंडाई, मिठाई अथवा आइसक्रीम जैसे पेय और खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल चलन में बनाए हुए हैं। लेकिन इसे अनेक कुरूपताओं की जड़ बताकर होली में इसके स्थान पर देसी और अंग्रेजी शराब को घुसेड़ने के अथक प्रयास जोर शोर से चले, जो काफी हद तक सफल साबित हुए हैं। फल स्वरुप पहले की अपेक्षा होली कुछ-कुछ बदरंग भी हुई है। इस विद्रूप नशे के चलते होली के दौरान अपवाद स्वरूप अपराध घटित होने के दुखद समाचार मिलने लगे हैं। मेल मिलाप के इस त्यौहार को कलंकित करने का अधिकतम श्रेय शराब के नशे को ही जाता है। वर्ना भांग का नशा तो हिंदू धर्मावलंबी शिवरात्रि पर भी करते हैं। लेकिन इतिहास और वर्तमान समय गवाह है, शिवरात्रि के पावन त्यौहार पर भांग खाने या पीने के चलते कहीं से भी शांति भंग होने के समाचार ना कभी प्राप्त हुए और ना ही आज हो रहे हैं। हम यहां भांग या फिर अन्य किसी भी प्रकार के नशे की हिमायत नहीं कर रहे। केवल बताना चाहते हैं कि अन्य त्योहारों की तरह इस त्यौहार में भी बाजारवाद बरसों से घुसने की फिराक में है, लेकिन वह सफल नहीं हो पा रहा। और यदि सफल हुआ है तो केवल शराब के नशे के रूप में, जिस पर जल्दी से जल्दी अधिकतम नियंत्रण की अत्यावश्यकता है।
यदि हमारे धर्म शास्त्रों का अध्ययन किया जाए तब भी बात यही निकल कर सामने आती है कि होली का त्योहार प्रेम और भक्ति का ही महापर्व है। क्योंकि यह उन भक्त प्रहलाद के अग्नि से सुरक्षित बच जाने पर मनाया जाता है, जो बाल्य काल में ही ईश्वर के परम भक्त हो गए थे। वे ईश्वर भक्ति से विमुख हो चुके अपने पिता को प्रेम और भक्ति के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते रहे। यह और बात है कि बदले में उनका अनिष्ट करने की अनेक चेष्टाएं हुईं। उन्हीं में से एक प्रयास उन्हें अग्नि में जलाए जाने का किया गया। किंतु ईश्वर कृपा से भक्त प्रहलाद का बाल भी बांका ना हुआ। बल्कि ब्रह्मा जी से ना जलने का वरदान प्राप्त करने वाली वह होलिका जलकर भस्म हो गई जिसने रिश्तो की पवित्रता को कलंकित करते हुए भक्त प्रहलाद को मृत्यु के हवाले करने का षड्यंत्र रचा था। तभी से हिंदू समाज होलिका को प्रतीकात्मक रूप से जलाता चला आ रहा है। जबकि बालक प्रहलाद के उस भयावह अग्निकांड से बच जाने पर अभी तक रंग गुलाल उड़ाकर खुशियां मनाई जा रही हैं। पूर्व में यह त्यौहार पूर्णिमा से लेकर रंग पंचमी तक 6 दिन का मनाया जाता रहा है। बल्कि यह लिखना भी अतिशयोक्ति नहीं होगा कि कुछ दशक पहले तक होली का त्यौहार पूरे फाल्गुन महीने भर मनाया जाता था। इस महीने में कोई भी मेहमान घर में आ जाता या फिर हम मेहमानी करने अपने किसी रिश्तेदार नातेदार के यहां पहुंच जाते तो फिर रंगों में सराबोर हुए बगैर उन घरों से बाहर निकलना असंभव ही माना जाता रहा है। बल्कि फाल्गुन के महीने में लोग रिश्तेदारी में यह मन बनाकर ही जाते थे कि वहां उन्हें रंग-बिरंगा होना ही है। यहां तक कि फागुन के महीने में कहीं शादी हुआ करती थी तो वर और वधु, दोनों पक्ष के लोग पूरे उत्साह के साथ कीमती कपड़ों की चिंता किए बगैर रंगों से तरबतर होली खेला करते थे और किसी भी कोने से नाम मात्र का एतराज खड़ा नहीं होता था। लेकिन कालांतर में लोग कीमती कपड़ों का हवाला देने लगे।रंग-बिरंगे लोगों के बीच साफ सुथरे और झकाझक कपड़ों में इठला के चलना स्टेटस सिंबल बनता चला गया। नतीजा यह निकला कि अब होली केवल धुलेंडी और रंग पंचमी के आसपास सिमट कर रह गई है। इन दो दिनों में से भी धूलेंडी अर्थात प्रतिपदा के दिन अब अधिकांश स्थानों पर सूखी होली खेली जाती है। लोग एक दूसरे को गुलाल लगाकर रस्म अदायगी करते दिखाई देते हैं । बस रंग पंचमी भर एकमात्र ऐसा दिन रह गया है जब लोग पानी में घोलकर रंग एक दूसरे पर डाल पाते हैं। उसमें भी यह आवश्यक हो चला है कि रंग डालने वाला और डलवाने वाला, दोनों परिचित तथा रंग रंगीले होने लिए रजामंद होने चाहिए। यह दौर भी आधे दिन तक चलता है। इसके बाद लोग नहा धोकर एक प्रकार से इस त्योहार से फारिग हो जाते हैं। भला हो पुरानी परंपराओं को मानने वालों का, जिन्होंने अभी तक द्वितीया के दिन बहन बेटियों को अपने घर आमंत्रित करने या फिर उनके यहां जाकर तिलक करने और होली खेलने का क्रम बनाए रखा है।
अंत में आप सभी को रंगों के त्यौहार होली का महापर्व की ढेर सारी शुभकामनाएं। ईश्वर से प्रार्थना है कि हम सब प्रेम, सम्मान और मर्यादाओं के रंगों से तरबतर होली खेलने के लिए प्रेरित हों। रंग और गुलाल डालने से पूर्व सामने वाले की भावनाओं का सम्मान बनाए रखें। यदि हृदय में सनातन धर्म और हिंदू त्योहारों को कलंक से बचाए रखने की थोड़ी सी भी जिजीविषा शेष हो तो कम से कम इन त्योहारों के दिन हर प्रकार के नशे से निर्णायक दूरी अवश्य बनाए रखें। एक बार फिर सभी देशवासियों को रंगों के त्यौहार की अनंत शुभकामनाएं।
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