पत्रकार धनंजय सिंह पर हमला कानून व्यवस्था पर कलंक

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पत्रकार धनंजय सिंह पर हमला कानून व्यवस्था पर कलंक

पुलिस का बदमाशों के प्रति नरम रवैया सवालों के घेरे में

प्रधान संपादक
मोहन लाल मोदी की कलम से
भोपाल के जानेमाने पत्रकार धनंजय सिंह पर हमला कानून व्यवस्था पर कलंक के समान चस्पा हो गया है। इस मामले में उभर कर सामने आया पुलिस का बदमाशों के प्रति नरम रवैया सवालों के घेरे में है। धनंजय सकुशल हैं, यह परिस्थितिजन्य परिणाम है। वर्ना तो उनकी कुशलता में पुलिस की रत्तीभर भी भूमिका नहीं है। उन पर प्राण घातक हमला हुआ था। यदि लोहे की रॉड का हमला हाथ पर नहीं झेलते तो वार सीधा सिर पर होना था।

बेहद तीव्रता के साथ किए गए उक्त प्रहार से उनकी जान भी जा सकती थी। पुलिस तो तब आई जब बदमाशों ने अपने मन की कर ली। बल्कि सारा मामला ही पूर्णता को प्राप्त हो गया। उस पर तुर्रा ये कि जब पुलिस आई भी तो वो घायल फरियादी पक्ष की बजाय आरोपी के घर पर बैठकर उसका मनोबल बढ़ाती नजर आई। अब खबर मिल रही है कि आरोपी के यहां तशरीफ लेकर पहुंचने वाले पुलिस अधिकारी दोनों पक्षों की ओर से क्रॉस केस दर्ज किए जाने की तैयारी में हैं।

इससे तो अच्छा होता कि पुलिस आती ही नहीं। ज्यादा से ज्यादा होता ये कि पुलिस पर हमेशा की तरह घटना स्थल पर समय से न पहुंचने का आरोप ही तो लगता। सो इसमें पुलिस के लिए कौनसी नई बात होती। लेकिन उसके वहां नहीं पहुंचने से उपद्रवियों के हौंसले तो बुलंद नहीं होते। नतीजतन एक वरिष्ठ पत्रकार को थाने जाकर अपनी फरियाद सुनानी पड़ गई। वहां भी उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार नहीं किया गया। इससे यह भी स्पष्ट हो गया कि पुलिस महकमे में अखबार नवीसों के प्रति कितना सम्मान है।

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जिन धनंजय सिंह को मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान, गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा व्यक्तिगत रूप से जानते हों, उन जैसे वरिष्ठ पत्रकार के साथ पुलिस वालों को ये रवैया है तो सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि वो अन्य गैर नामवर पत्रकारों के साथ कितना सम्माज जनक व्यवहार करते होंगे। इस पूरे मामले का सबसे ज्यादा शर्मनाक पहलू तो ये रहा कि भोपाल डीआईजी को दो बार फोन किए जाने के बावजूद पत्रकार को पुलिस मदद नहीं मिल पाई।

बल्कि ये जवाब मिला कि चूंकि उस क्षेत्र की थाना प्रभारी महिला हैं, इतनी रात को उन्हें घटना स्थल पर कैसे भेजा जा सकता है? तो क्या ये मान लिया जाए कि जिस थाने की प्रभारी महिला अधिकारी हों, वहां के पीडि़तों को पुलिस से किसी भी तरह की वैधानिक मदद की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। ये न केवल एक पत्रकार की समय पर मदद न करने का मामला है, बल्कि एक महिला अधिकारी के मान सम्मान की अवमानना भी है।

क्यों कि अभी तक ये स्पष्ट नहीं हुआ है कि अयोध्या नगर थाना प्रभारी रेणु मुराब ने रात को घटना स्थल पर जाने से इंकार किया हो। न ये बात सामने आई है कि थाना प्रभारी ओर से ये कहा गया हो कि वे एक महिला हैं, इसलिए वे देर रात मुसीबत में फंसे किसी पीडि़त की मदद नहीं कर सकतीं। कुल मिला कर जब मामला पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंच गया, तब कहीं जाकर पुलिस ने घटना स्थल पर आमद दर्ज कराई।

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अब ये हाई प्रोफईल मामला पुलिस की कार्यप्रणाली पर निर्भर है। वरिष्ठ पत्रकार को पूरा न्याय मिल ही जाएगा, इसमें अभी तक संशय है। क्यों कि अभी तक पुलिस का जो रवैया सामने आया है वो फरियादी पक्ष को हतोत्साहित तथा आरोपियों को प्रोत्साहित करने वाला ज्यादा रहा है। इसके बाद भी अनेक संगठनों और ग्रुपों में विभाजित पत्रकार एकजुट होकर धनंजय सिंह को न्याय दिलाने की निर्णायक पहल नहीं कर पाते हैं तो उन्हें अपनी सुरक्षा के प्रति भी आस्वश्त नहीं रहना चाहिए।

क्योंकि ये झगड़ा एक वरिष्ठ पत्रकार के घर चलकर आया है। धनंजय प्रताप सिंह पर उनकी कॉलोनी में ही शराबियों ने लोहे की रॉड से हमला किया है। उन्होंने केवल अपने घर के पास बैठकर शराब पीने से तीन युवकों को रोका था। इस पर शराबियों ने उन पर जानलेवा हमला कर दिया। इसमें वो गंभीर रूप से घायल हो गए। शोरगुल सुनकर पड़ोसी वहां न पहुंचते तो मामला अनिष्टकारी भी हो सकता था।

धनंजय प्रताप सिंह पर शनिवार को तब हमला हुआ, जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मध्य प्रदेश में कानून व्यवस्था को लेकर पुलिस के आला अधिकारियों के साथ अहम बैठक की थी। उन्होंने घटना से कुछ घंटों पहले ही पुलिस के आला अधिकारियों से कहा था कि अपराधी भय से थरथराने चाहिए। लेकिन सच्चाई सबके सामने है, पुलिस के भय से अपराधी तो नहीं थरथरा रहे हैं।

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