अनियंत्रित कोरोना से आम आदमी भयाक्रांत

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अनियंत्रित कोरोना से आम आदमी भयाक्रांत

अनियंत्रित कोरोना : दिनोंदिन हाथ से निकलते जा रहे हालात,

धींगामस्ती यूं ही चलती रही तो…

प्रधान संपादक
मोहन लाल मोदी की कलम से
लगातार अनियंत्रित हो रहे कोरोना के मामले अब आम आदमी को भयाक्रांत कर रहे हैं। वहीं केंद्र सहित विभिन्न राज्य सरकारों की कोरोना नीति दिग्भ्रमित दिखाई दे रही है। नतीजा ये है कि हालात दिनोंदिन हाथ से निकलते जा रहे हैं। इसके बावजूद न तो सरकार ये समझ पा रही कि अब कोरोना के साथ निर्णायक युद्ध होना चाहिए। न ही आम जनता समझने को तैयार है कि उसकी धींगामस्ती यूं ही चलती रही तो अनिष्ट होना तय है।

इस भावी विडम्बना का सामने आना अब शुरू भी हो गया है। भोपाल सहित देश के विभिन्न महानगरों में संक्रमण और उससे होने वाली मौतों के आंकड़े बढ़ते ही जा रहे हैं। नतीजा ये है कि अनेक स्थानों पर श्मशान घाट छोटे पडऩे लगे हैं। क्षमता से ज्यादा लाशें एक साथ जलाने की मजबूरी है। क्यों कि उतने ही जलने के लिए और लाईन लगाए बाहर खड़े रहते हैं।

अस्पतालों के वार्डों, गैलरियों, कचराघरों और यहां तक कि आईसीयू में भी लाशें बेतरतीब पड़ी हुई हैं। पता ही नहीं चल रहा कि मरने वाला रामलाल है या फिर श्याम लाल। किसी की लाश किसी और के परिजनों को सौंपी जा रही हैं। अंतिम संस्कार ऐसे हो रहे हैं, मानो गंदे कचरे को जलाया जा रहा हो। संक्रमण का आतंक कुछ ऐसा है कि मृतकों के परिजन भी शवों को हाथ लगाने से डर रहे हैं।

अस्पताल में एक मरता है, श्मशान में रशीदें चार कट रही होती हैं। यानि कि मौत के घोषित आंकड़े और हैं तथा अघोषित आंकड़े कुछ और। देश की सबसे बड़ी अदालत इस दर्द से व्याकुल है और खुद संज्ञान ले रही है। विद्वान न्यायाधीश भी मान चुके हैं कि सब कुछ दिल को दहला रहा है, अमानवीय है। इसके बावजूद सरकारें कह रही हैं कि हालात काबू में हैं और डरने की कोई बात नहीं है।

दावों को प्रमाणित करने के लिए वैश्विक आंकड़ों से तुलना कर दी जाती है। समझा दिया जाता है कि हम अमुक देश से लाख गुना बेहतर हैं। नेताओं का तो काम ही आम आदमी को भरमाना ही है। लेकिन चिंता की बात तो ये है कि विपक्ष भी ऐसी विपदा के वक्त केवल और केवेल राजनीति ही कर रहा है। उसका एक भी सुझावात्मक और रचनात्मक प्रयास प्रबुद्ध वर्ग को दिखाई नहीं देता।

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हां सोशल मीडिया पर जरूर कुछ चारणभाट सरीखे अंधभक्त अपने नेता को दीन दयाल साबित करने में उद्यमशील हैं। सत्ता पक्ष की ओर से भी उसका मीडिया सेल जनता के बचाव से ज्यादा पार्टी की छवि चमकाने के काम आ रहा है। ले-देकर जनता को सभी ने भगवान भरोसे छोड़ दिया है। वह जिये अथवा मरे, किसी को परवार नहीं है। इसके लिए दोषी भी जनता ही है।

अनियंत्रित कोरोना जैसे खतरनाक रोग को भी बना रखा मजाक

क्यों कि अब वो खुद भी जनता नहीं रही। जो सोशल मीडिया सहित विभिन्न सार्वजनिक प्लेटफार्मों पर सक्रिय हैं वे या तो भाजपा के लोग हैं अथवा कांग्रस के। अधिकांशों का अपना स्वतंत्र सोच जैसे गायब ही हो गया है। जो थोड़े बहुत राजनीति से निरपेक्ष हैं, उनने अनियंत्रित कोरोना जैसे खतरनाक रोग को भी मजाक बना रखा है। यानि कि आम आदमी के बीच गंभीरता का अभाव।

तो फिर सरकार और विपक्ष आम आदमी को गंभीरता से लेंगे, ऐसी कल्पना भी कैसे की जा सकती है। सार्वजनिक जीवन में भी आम आदमी की बेपरवाही स्पष्ट दृष्टव्य है। एक दुपहिया वाहन पर तीन तीन लोग घूम रहे हैं। बाजारों में भीड़ एक दूसरे को ऐसे धकिया रही है, मानो कल शहर बंद होने वाला है। मास्क को तो बहुत बड़ी आबादी ने गैर जरूरी चीज मान लिया है।

नतीजा सबके सामने है, अनियंत्रित कोरोना एक से दूसरे को ट्रांसफर हो रहा है। अस्पताल फुल हो चले हैं, निजी नर्सिंग होमों ने आपदा को अवसर मान लिया है। वहां एक एक दिन के 50 हजार तक के बिल बनाए जा रहे हैं। गैर कोरोना मरीजों को भी शक की निगाह से देखा जा रहा है। नतीजतन लोगों को आकस्मिक चिकित्सा सहायता मिलनी बंद हो गई है। फलस्वरूप बीमार लोग सडक़ों पर दम तोडऩे लगे हैं।

फल स्वरुप आम आदमी भयाक्रांत है। फिर भी सरकारें विपक्ष और आम जनता गैर जिम्मेदार बने हुए हैं। दुबारा दुहराता हूं, नेताओं को तो हम नहीं सुधार सकते, लेकिन हम तो सुधर सकते हैं। क्यों कि यदि हम सुधर गए तो इन्हें भी हर हाल में सुधरना होगा। अत: हम अपने सुधार की दो बानगियां देखें- पिछले दिनों छत्तीसगढ़ में एक पुलिस वाले ने सायकिल सवार को अकारण घूमने पर उसकी जमकर सुताई लगा दी।

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सोशल मीडिया पर हायतौबा मची तो नेताओं ने जनता के पक्ष में चिल्लाना शुरू कर दिया। पुलिस वाला निलंबित कर दिया गया। इसी प्रकार झारखंड के पलामू जिले में तीन पुलिस वालों ने मास्क लगाए बगैर घूम रहे एक व्यक्ति को सूत दिया। फिर सोशल मीडिया पर बवाल मचा और नेतागिरी शुरू हो गई। तीनों पुलिस वाले लाईन अटैच कर दिए गए। ये दोनो दृश्य क्या हमसे ये सवाल नहीं करते कि हम क्या कर रहे हैं।

सभी को पुलिस वालों का दोष तो दिखा। लेकिन ये नहीं दिखा कि कोरोना इन्ही लापरवाह लोगों की वजह से लगातार फैल रहा है। संतरी से लेकर प्रधान मंत्री तक, सबके सब हाथ जोड़ कर मिन्नतें कर रहे हैं। भैया अकारण बाहर मत निकलो, चेहरे पर मास्क लगाए रखो, सोशल डिस्टेंसिंग को मत भूलो। लेकिन नहीं, हम तो निकलेंगे, खुद तो मरेंगे ही दूसरों को भी मौत बांटते फिरेंगे।

कई सस्पेंड हुए, तो बहुतों को खा गया अनियंत्रित कोरोना

ऐसे में इनमें डंडे नहीं पड़ेंगे तो क्या फूल मालाएं गले में पहनाई जाएंगी। हां हम मानते हैं कि पुलिस के डंडे ज्यादा, बहुत ज्यादा जोर से चले। लेकिन क्या कभी ये सोच में नहीं आता कि इन पुलिस वालों को पूरे तीन महीने सडक़ों, राजमार्गों पर ही बीत गए। भरी गर्मी, चिलचिलाती धूप, लू के थपेड़ों के बीच ये रास्तों पर डटे रहे। लोगों की गालियां भी खाते रहे। कई सस्पेंड हुए तो बहुतों को अनियंत्रित कोरोना खा गया।

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सीआरपीएफ के जवान भी इसकी चपेट में इन्हीं हरकतों की वजह से आए। संक्रमण ने एनडीआरएफ जैसी बेहद महत्व पूर्ण टीम को भी नहीं बख्शा। क्यों कि ये आम आदमी को बचाने में खुद को होम करते रहे। यही हाल चिकित्सकों, नर्सों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों के हैं। हमारी बेपरवाहियों के चलते अब इनका भी धैर्य टूट रहा है। बेशक लापरवाहियां इनकी ओर से भी हुई हैं और हो भी रही हैं।

लेकिन बात वहीं पर आती है कि पहले हमें सुधरना होगा। रोको अपने परिजनों को, उनसे कहो बहुत जरूरी हो तभी बाहर जाओ, वर्ना घर में ही रहो। मास्क को तो अपनी जीवनशैली में शामिल कर ही लो। हर अनजान से दूरी बना कर रखो, न जाने कौन संक्रमित तुम्हें मौत बांट कर चला जाए?

जब भरोसा हो जाए के हां हम सुधर गए हैं। फिर देखते हैं ये नेता, सरकार, विपक्ष और नौकरशाह कैसे लाईन पर नहीं आत। अरे ये कोरोना तो भागता दिखाई देगा। लेकिन पहले हम इसे भगाने का पूरी तरह से मन तो बनाएं।

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