कोरोना मरीजों को बेड नहीं मिल रहे

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केंद्र की ओर से दिल्ली को 8 हजार पलंग

कोरोना मरीज ही दोषी

प्रधान संपादक
मोहन लाल मोदी की कलम से
कोरोना के अप्रत्याशित संक्रमण से जूझ रहे कुछ राज्यों और महानगरों के अस्पतालों में अब कोरोना मरीजों को बेड नहीं मिल रहे हैं। जानकारों का कहना है कि इसके लिए और कोई नहीं, कोरोना मरीज ही दोषी हैं। अब ये बात भी अजीब है कि अस्पतालों में यदि कोरोना मरीजों को बेड नहीं मिल रहे हैं, तो इसके लिए करोना मरीज ही दोषी कैसे ठहराए जा सकते हैं।

इस बात का जवाब ये है कि जब से देश भर का लॉकडाऊन अनलॉक में तब्दील हुआ है, तभी से अधिकांश प्रांतों के नागरिकों ने खुद को स्वतंत्र ही नहीं, स्वच्छंद भी मान लिया है। उसके आज कल के व्यवहार को देखकर ऐसा प्रतीत होता है, मानो देश में कोरोना की मौजूदगी शेष रही ही नहीं। किसी के चेहरे पर मास्क नहीं है तो कोई सोशल डिस्टेंसिंग भूल बैठा है।

खुले हुए बाजारों में धक्का मुक्की के दृश्य आम हो चले हैं। दुकानदार भी अपने ग्राहकों के सामने ये शर्त नहीं रख पा रहे हैं कि वे ऐसे किसी भी शख्श को सामान नहीं बेचेंगे जो स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन द्वारा निर्धारित नियम कानूनों का उल्लंघन करता दिखाई देगा। लिखने का आशय ये कि सब के सब एक प्रकार से अपनी सुरक्षा के लिए निर्धारित बंदिशों को तिलांजलि दे बैठे हैं।

कोरोना मरीजों को बेड नहीं मिल रहे

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यही कारण है कि ये जो भीड़ है और इसमें जो लोग अपने हिस्से की ईमानदारी के प्रति बेपरवाह हैं, उनमें से अधिकांश कोरोना संक्रमण का शिकार होते नजर आ रहे र्हैं। इनकी संख्या भी इतनी ज्यादा है कि अधिकांश महानगरों में तो अस्पताल कोरोना मरीजों से भर चुके हैं। ये बात और है कि अधिकांश प्रायवेट अस्पताल वाले जानबूझ कर गैर जिम्मेदारारना रवैया प्रदर्शित कर रहे हैं।

कोरोना मरीजों के लिए 10 बोगी की ट्रैन

बाकी सरकारी अस्पतालों का तो वाकई में बुरा हाल है। वहां अब पलंगों की कमी साफ साफ नजर आने लगी है। यही कारण है कि दिल्ली सरकार ने तो दस बोगी की एक ट्रेन ही आईसोलशन वार्ड के रूप में राजधानी के एक स्टेशन पर खड़ी करा ली है। ताकि जब अस्पतालों के वार्ड पूरी तरह से भर जाएं तो मरीजों को इस ट्रेननुमा अस्थाई आईसोलशन वार्ड में भर्ती किया जा सके।

ये तो कुछ भी नहीं, देश की सिरमौर कही जाने वाली दिल्ली और दिलवालों के रहने का ठिकाना मानी जाने वाली दिल्ली अब खुदगर्ज हो रही है। वह ये फैसला लेने को मजबूर हो चुकी है कि अब उसके राज्य में जितने भी अस्पताल राज्य सरकार द्वारा संचालित हैं, उनमें केवल दिल्ली वासियों का इलाज ही किया जा सकेगा।

कोरोना मरीजों को बेड नहीं मिल रहे

मतलब साफ है, इन अस्पतालों में अब दिल्ली से बाहर के मरीजों का इलाज करने की मनाही है। हमें लगता होगा कि वहां की सरकार क्षेत्रीयवाद को बढ़ावा दे रही है। उस पर इस प्रकार के आरोप लग भी रहे हैं। लेकिन सही तरीके से सोचा जाए तो ऐसा नहीं है। सरकार की पहली प्राथमिकताा है स्थानीय लोगों को समुचित उपचार मुहैया कराने की।

वह इस प्रतिबंध के बगैर तो ऐसा करने में सफला होती दिखाई नहीं देती। इसलिए उसे कथित अपने और पराए के भेदपूर्ण व्यवहार को अपनाना पड़ रहा है। महाराष्ट्र, और खासकर वहां के महा नगर मुंबई की हालत भी लगभग ऐसे ही मोड़ पर पहुंच चुकी हैं। हो सकता है कि वहां की सरकार को भी आने वाले दिनों में ऐसा ही कुछ व्यवहार करना पड़ जाए।

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घूमफिर कर बात एक बार फिर वहीं परआ जाती है कि इन बिगड़ रहे, बल्कि बिगड़ चुके हालातों के लिए जिम्मेदार कौन है? तो जवाब वहीं पर दिखाई देता है, जहां से हमने आज की बात की शुरूआत की थी। और शुरूआत ये थी कि कोरोना मरीजों को बेड नहीं मिल रहे है तो इसके लिए कोई और न होकर कोरोना मरीज ही दोषी नजर आता है।

क्यों कि यही वो इकाई है जो स्वस्थ रहने तक कोविड-19 से बचत हेतु निर्धारित नियम कायदों का बेपरवाही के साथ उल्लंघन कर रही है। अब जब 8 जून से देश भर के अधिकांशा प्रांतों ने अपने यहां के मॉल, होटल, बड़े बड़े आऊटलेट, मंदिर खोल दिए हैं, तो बुद्धिजीवियों की पेशानी पर बल स्पष्ट देखने को मिल रहे हैं।

इन्हें डर है कि आम नागरिक कहीं सार्वजनिक तौर पर ऐसा व्यवहार न अपनाने लग जाएं, मानो उसेे लॉकडाऊन की बजाय किसी कैद से छुटकारा मिल गया हो। चिंता का कारण इसलिए भी है, क्यों कि यदि इस बार चूक हुई तो हालात थोड़े बहुत नहीं बिगड़ेंगे। बल्कि पहले की अपेक्षा कई कई गुना अधिक बिगड़ेंगे।

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इतनी बुरी तरह बिगड़ेंगे कि हालातों पर नियंत्रण किया जाना भी लगभग असंभव सा हो जाने वाला है। इसका प्रमाण ये है कि पिछले माह की शुरूआत तक हम कोरोना संक्रमित देशों की टॉपटेन लिस्ट में शामिल तक नहीं थे। जबकि वर्तमान में हमारा क्रम छठी पायदान पर आ गया है।

यदि संक्रमण की गति हम सबकी लापरवाही से ऐसे ही बढ़ती रही तो भारत को संक्रमितों का सिरमौर बनने में भी ज्यादा समय नहीं लगने वाला। इसलिए बार बार यह समझाईश दी जाती है कि देर से ही सही, अब संभलने का वक्त है। संभल जाओं वर्ना हालात तुम्हें संभलने का मौका तक नहीं देने वाले। तब तुम्हें खुद को संभालना भी असंभव होने वाला है।

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