म.प्र. के पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बहाल करे नई कैबिनेट

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म.प्र. के पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बहाल करे नई कैबिनेट

जो माफिया नहीं मानें, उन पर एस्मा के समकक्ष कार्यवाही करें

प्रधान संपादक
मोहन लाल मोदी की कलम से
अब जब शिवराज सरकार की कैबिनेट का विस्तार हो गया है, तब इससे यह प्राथमिक उम्मीद है कि ये नई कैबिनेट म.प्र. के पब्लिक ट्रांसपोर्ट को तत्काल प्रभाव से बहाल करे । यदि कोई बस ऑपरेटर अथवा परिवहन माफिया नहीं माने तो मध्य प्रदेश की यह नई कैबिनेट उन पर एस्मा के समकक्ष कार्यवाही करे। क्यों कि प्रदेश की लोक परिवहन व्यवस्था को जाम हुए काफी लम्बा अर्सा हो गया है। फलस्वरूप आम आदमी को पहाड़ समान परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

जनता को अब ये समझ में आ जाना चाहिए कि सरकारी लोक परिवहन का क्या महत्व होता है। बसों के पहियों को थमे लगभग एक तिमाही का वक्त हो चुका है। पहले सरकार लॉकडाउन के पालन में इन्हें नहीं चलने दे रही थी। अब खुद बस ऑपरेटर परिवहन बहाल करने को तैयार नहीं हैं। उस पर तुर्रा ये कि जनता की सेवा के लिए ऊंचे पदों पर बैठे नौकरशाह इस परेशानी से एकदम बेखबर दिखाई दे रहे हैं। नतीजतन वे बसें भी खड़ी करके रखी गई हैं, जिनका संचालन सरकार अथवा सरकार से सम्बद्ध किसी निगम द्वारा संचालित किया जा रहा है।

ये साजिश भी इसलिए है, ताकि जनता परेशान हो और जन प्रतिनिधि बस ऑपरेटरों की नाजायज मांगों के सामने झुकने को मजबूर हो जाएं। लेकिन अब शिवराज सरकार का मंत्रिमंडल विस्तृत हो गया है। अत: आवश्यक हो चला है कि जिसे भी सडक़ परिवहन मिले, वो प्राथमिकता से इस मामले को जनहित में निस्तारित करे। फिलहाल बस ऑपरेटर सरकार से पचास फीसदी किराया बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। ये एक प्रकार से जनता को लूटने का परमिट हासिल करने जैसा कृत्य ही है। इसे कतई माना नहीं जाना चाहिए।

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क्यों कि अभी तक लॉकडाउन की मार से आम आदमी उबर नहीं पाया है। वो किराए के नाम पर अनाप शनाप राशि चुकाने की हालत में नहीं है। हालांकि परिवहन के नाम पर उसकी लुटाई तो अभी भी जारी है। बसों के अभाव में वैध और अवैध वैकल्पिक परिवहन साधन यात्रियों से दुगना चौगुना ही नहीं, दस गुना तक किराया वसूलने से बाज नहीं आ रहे हैं। बस ऑपरेटरों को यही हालत अपने पक्ष में दिखाई दे रही है। उनका तर्क है कि जो यात्री परिवहन के दूसरे साधनों को अनाप शनाप किराया देने में सक्षम हैं, वो बस वालों को किराया बढ़ा कर क्यों नहीं दे सकते?

लेकिन समझने की बात ये है कि ये आम आदमी की मजबूरी है, उसकी रजामंदी नहीं। अत: सरकार को चाहिए कि वो पहले से ही महंगे बस किरायों को और ज्यादा आसमान छूने की इजाजत न दे। साथ में यह भी तय हो कि बसों के पहिए अब और ज्यादा नहीं थमने चाहिए। यदि कुछ ऑपरेटर अपनी हठ नहीं त्यागते हैं तो फिर उन पर उसी प्रकार कार्यवाही की जानी चाहिए, जैसी आवश्यक सेवा की बहाली के लिए सरकारी कर्मचारियों पर एस्मा के तहत की जाती है। सरकार से भी एक सवाल है, जब शराब ठेकेदारों ने मनमानी करनी चाही तो दुकानों को सरकारी कब्जे में ले लिया गया।

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चिकित्सकों अथवा उनके जैसे आवश्यक सेवा क्षेत्र के लोगों ने हड़ताल जैसी धमकी दी तो उन पर एस्मा लाद दिया गया। तो फिर क्या कारण है कि बस ऑपरेटरों के प्रति नरमी बरती जा रही है। कहीं ये इसलिए तो नहीं कि अधिकांश बस ऑपरेटर या तो नेताओं के आदमी हैं, या फिर खुद नेताओं ने ही इस मुनाफे के धंधे पर कब्जा कर रखा है। इस सबके बावजूद सरकार को यह याद तो रखना ही होगा कि वो जनता द्वारा जनता की सेवा के लिए चुनी गई है।

एक बात और, अब सबक मिलने के बाद सरकार को लोक परिवहन की नई व्यवस्था सरकारी स्तर पर ईजाद करनी चाहिए। यह भी मानना चाहिए कि म.प्र. का राज्य सडक़ परिवहन निगम बंद करने का फैसला एकदम गलत था। अब उस फैसले को पलटने का वक्त आ गया है। जनता को भी मुनाफाखोर बस ऑपरेटरों की ज्यादतियों से सबक लेकर अब सरकारी लोक परिवहन की नई व्यवस्था करने की मांग उठानी चाहिए।

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