उमाश्री और ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक अवश्य पढ़ें

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ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक

क्यों कहा था, महाराज कुए में कूदने को कहेंगे तो उसमें भी कूद जाएंगे

नेता हो तो ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) जैसा, यह बात आज मध्य प्रदेश का मंत्रिमंडल देखकर पूरी तरह से स्पष्ट हो गई। साथ में यह भी समझ आ गया कि सिंधिया समर्थक विधायकों मंत्रियों ने यह क्यों कहा था कि महाराज कुए में कूदने के लिए कहेंगे तो हम उसमें भी कूद जाएंगे। इन दोनों बातों को यदि विस्तार से समझना है तो हमें इस रिपोर्ट को पूरी तरह से समझना होगा।

मोहन लाल मोदी की कलम से
भोपाल। आज मंत्रिमंडल में ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) समर्थकों की संख्या कुल ग्यारह हो गई। तब अनेक पुराने भाजपाइयों को लग रहा होगा कि महाराज ने राजहठ की और अपने समर्थकों का भविष्य सुनिश्चित करके ही माने। उन्हें ये भी लग रहा होगा कि इससे मंत्री पद के परंपरागत भाजपाइयों को मन मारकर रह जाना पड़ गया। लेकिन ये बहुत कम लोगों की समझ में आया होगा कि सिंधिया ने जो कुछ किया वो सही किया।

बल्कि ये कहा जाना चाहिए कि सिंधिया ने आज ये साबित कर दिखाया कि असल में नेता को कैसा होना चाहिए। सिंधिया के दायित्व बोध को समझने के लिए हमें भाजपा के पिछले इतिहास को समझना होगा। यहां बात आती है, पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री उमा भारती की। उमा भारती वो नेता हैं, जिन्होंने कांग्रेस की पंद्रह साल पुरानी सरकार को रिकार्ड बहुमत के साथ जड़ से उखाड़ फेंकने का करिश्मा कर दिखाया था।

बाद में जब वे मुख्यमंत्री पद से अपदस्थ हुईं तो इस पार्टी के हजारों नेताओं व कार्यकर्ताओं ने उक्त घटना को अपने नेता का अपमान माना। नतीजतन जब उमाश्री ने भाजपा छोड़ी तो उनके साथ कई पुराने दिग्गज भाजपाइयों ने भी सत्ता वाली पार्टी को पुराने वस्त्र की भांति त्याग दिया। तब भाजपा कार्यकर्ताओं का बहुत बड़ा धड़ा तो मानों उमाश्री के साथ सडक़ों पर ही उतर आया था।

समर्थकों को देतीं सम्मान, तो रचा जा सकता था इतिहास

यदि उमाश्री उक्त कार्यकर्ताओं और अपने समर्थक नेताओं की बात को सम्मान देतीं तो हो सकता है कि मध्य प्रदेश में भारतीय जनशक्ति की सरकार निर्वाचित होने का इतिहास भी रचा जाता। लेकिन भाजश नेताओं और कार्यकर्ताओं को जल्दी ही समझ में आ गया कि उनका नेता अपने मन की करता है। उस पर तुर्रा ये कि किसी की सुनता तक नहीं है। नतीजा ये हुआ कि एक के बाद एक रघुनंदन शर्मा और प्रहलाद पटेल जैसे धुरंधर पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री उमा भारती समर्थक वापिस भाजपा का दामन थामते चले गए।

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अंत में खुद उमाश्री की हालत ये हो गई कि उन्हें भी एक दिन भाजपा में ही लौट जाना पड़ा। लेकिन तभी उमाश्री ने अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल की। जिसका पश्चाताप वे इस जीवन में तो कभी नहीं कर पाएंगी। वो पाप ये था कि उमाश्री ने अपनी घर वापिसी तो येनकेन प्रकारेण करा ली। लेकिन वे उन हजारों कार्यकर्ताओं के बारे में सोचना भूल गईं, जिन्होंने विपत्तिकाल में उमाश्री का साथ दिया था और बगैर सोच विचार किए भाजपा त्याग दी थी।

नतीजा ये निकला कि वो अधिकांश भाजश कार्यकर्ता आज तक राजनैतिक रूप से निर्वासित जीवन ही जी रहा है। कांग्रेस में वो हजम नहीं होना था और भाजपा में उसकी विधिवत वापसी हुई ही नहीं। उसी का परिणाम है कि पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री उमा भारती भाजपायी भीड़ में भी आज नितांत अकेली हैं। सरकारें बनती बिगड़ती हैं, लेकिन उनसे सलाह मशविरा तक नहीं किया जाता। लोधा लोधियों को छोड़ दें तो उनके पास अब कार्यकर्ताओं की पूंजी बची ही नहीं है।

राजनीति ये कहती है कि जिसके पास कार्यकर्ता नहीं होते, उस नेता की बात को कहीं भी महत्व नहीं दिया जाता। यही हाल आज उमाश्री का तब देखने को मिला जब मंत्रिमंडल के गठन को लेकर उन्होंने नाराजगी जाहिर कर दी। मतलब साफ है, एक वक्त वो था जब उमाश्री के बगैर मध्य प्रदेश भाजपा की कल्पना ही मिथ्या थी। आज जब मंत्रि मंडल का विस्तार हुआ तो उनसे सलाह मशविरा तक नहीं किया गया।

उमाश्री से ठीक उलट ज्योतिरादित्य सिंधिया जो एक – एक समर्थक का रखते हैं ध्यान

उमाश्री से ठीक उलट एक ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं, जो हृदय परिवर्तन भी करते हैं तो अपने समर्थकों के भले बुरे का भी ध्यान रखकर चलते हैं। सिंधिया की इस बात को उनका समर्थक वर्ग भलीभांति जानता है। शायद यही वजह रही कि जब बात कांग्रेस को छोडऩे की चली तो सिंधिया समर्थक मंत्रियों विधायकों को उनके अंधकारमय भविष्य का डर दिखाया गया।

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फिर भी वे मंत्री विधायक टस से मस नहीं हुए और एक ने तो यहां तक कह दिया था कि महाराज हमें कुए में कूदने को कहेंगे तो हम उसमें भी कूद जाएंगे। दाद देनी पड़ेगी ऐसे कार्यकर्ता की जो अपने नेता पर कुर्बान हुआ जाता है। लेकिन इस असीम विश्वास का श्रेय भी सिंधिया को ही जाता है। क्यों कि उनके समर्थक इस बात को भलीभांति जानते थे कि उनके महाराज जहां भी जिस हाल में भी रहेंगे, वे हमें किसी भी सूरत में नहीं बिसराएंगे।

ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक हुए स्थाई पूंजी में परिवर्तित

सिंधिया इस भरोसे पर खरे भी उतरे। आज जब मध्य प्रदेश के मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ तो उसकी तस्वीर देखकर साफ हो गया कि सिंधिया ने अपने समर्थकों का भरोसा खोया नहीं है। बल्कि उसे और अधिक मजबूती के साथ अपनी स्थाई पूंजी में परिवर्तित कर लिया है। ये तभी हो पाया, जब सिंधिया इस बात पर अड़े रहे कि जब तक उन पर आश्रित समर्थकों का भविष्य सुनिश्चित नहीं हो जाता, तब तक वे खुद भी किसी ऐश्वर्य अथवा वैभव को आत्मा से स्वीकार नहीं कर पाएंगे।

उनके इस भाव को भाजपा ने समझा। इससे एक बात यह भी साबित हुई कि जिस नेता के पास कार्यकर्ताओं की पूंजी होती है, वह दूध देने वाली गाय के समान सम्मान पाता है। आज सिंधिया को वह सम्मान सहज ही प्राप्त है। अत: आज यह कहना पड़ा कि नेता हो तो ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसा। यह भी समझ में आ गया कि उनके समर्थक मंत्रियों विधायकों ने ये क्यों कह दिया था कि महाराज कुए में कूदने को कहेंगे तो हम उसमें भी कूद जाएंगे।

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