दुष्कर्म मामले में जांच केवल IAS की ही क्यों

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दुष्कर्म मामले

एनजीओ संचालिका को भी आरोपी बनाया जाना उचित

प्रधान संपादक
मोहन लाल मोदी की कलम से
जांजगीर के पूर्व कलेक्टर पर चस्पा दुष्कर्मों के दाग ने जहां IAS जैसे कैडर को बदनामी के दायरे में ला खड़ा किया है, वहीं इस मामले ने सरकार से अरबों की फंडिंग प्राप्त करने वाले हजारों गैर सरकारी संगठनों यानि कि एनजीओ की कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। ये तो सभी को ज्ञात है कि एक एनजीओ संचालिका ने जांजगीर के पूर्व कलेक्टर जे.पी. पाठक पर दुष्कर्म के आरोप लगाए हैं। उनके खिलाफ पुलिस ने मामला भी दर्ज कर लिया है।

अब ये जांच के बाद स्पष्ट हो ही जाएगा कि उन पर लगाए गए आरोप कितने सही और कितने गलत हैं। किंतु इस मामले में एक बात ये कचोट रही है कि पुलिस ने शिकायत कर्ता महिला को एकदम मासूम मानकर उसे अछूता छोड़ दिया है। जबकि ये बात शिकायत कर्ता के कथनों से ही स्पष्ट है कि उसने अपनी देह जांजगीर कलेक्टर पाठक को उनसे लाभ लेने की गरज से सौंपी। शिकायत कर्ता महिला का ये आचरण एक प्रकार से कदाचार और सरकारी अफसर को प्रलोभन देने की श्रेणी में आता है।

लिहाजा उचित तो यही होता कि पुलिस द्वारा उक्त महिला के खिलाफ भी आपराधिक प्रकरण पंजीबद्ध करना चाहिए था। यह किया जाना इसलिए भी उचित होता, क्यों कि उसके द्वारा प्रस्तुत बयानों में कहीं पर भी इस बात का उल्लेख नहीं है कि तत्कालीन कलेक्टर ने उसे नुकसान पहुंचाने की किसी भी प्रकार की धमकी दी है। बल्कि कहा ये गया है कि शिकायत कर्ता महिला ने एनजीओ के पक्ष में फंडिंग हासिल करने और सरकारी दफ्तर में सेवारत अपने पति की तरक्की कराने के लिए खुद को सक्षम अधिकारी के सामने प्रस्तुत कर दिया।

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मतलब साफ है, शिकायत कर्ता महिला ने अपने महिला होने का पूरा पूरा फायदा उठाया तथा काम नहीं बनने पर पूरा का पूरा आरोप अकेले तत्कालीन कलेक्टर पाठक पर मढ़ दिया। इस बात को इसलिए भी काबिले गौर माना जाना चाहिए कि यदि शारीरिक सम्बन्ध भी बने तो उनमें आपसी रजामंदी के पुट शामिल है। इसके लिए यदि कलेक्टर ने महिला शिकायतकर्ता पर दवाब डाला भी था, तो नैतिकता और नियम कायदे के नाते दोषी वह भी ठहराई जाएगी।

दुष्कर्म मामले में जांच केवल IAS की ही क्यों

क्योंकि यदि महिला को किसी भी प्रकार का लोभ लालच नहीं था तो उसे अपना समर्पण करना ही नहीं था और न ही उस प्रस्ताव को मानना था, जिसे अब दैहिक शोषण बताया जा रहा है। यह शिकायत तब ज्यादा तार्किकता लिए हुए होती, जब इसे उसी समय दर्ज कराया जाता जब शिकायत कर्ता को पहली बार ऐसा लगा कि एक कलेक्टर द्वारा अपने पद का दुरूपयोग कर उसे गंदा करने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन ऐसा इस मामले में कहीं पर भी नजर नहीं आता।

खुद शिकायत कर्ता के लिखित मजमून पर गौर करें तो वह ये प्रतिपादित करता है कि शिकायत कर्ता ने एक हद तक लाभ लेने के प्रयास जारी रखे और जब वह आश्वस्त हो गई कि अब लाभ मिलना शेष नहीं रह गया है तो उसने अपनी जुबान खोल दी। हम ये कहीं नहीं कह रहे कि बगैर जांच के ही पाठक को पूरी तरह से निर्दोष घोषित कर दिया जाए। बल्कि आशय यह है कि दूध का धुला शिकायत कर्ता भी नहीं है।

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उसके बारे में भी इस बात की तसदीक होनी चाहिए कि उसने अभी तक कितने और कलेक्टरों, राजनेताओं, अन्य नौकरशाहों का विश्वास जीता और उनसे कितने बड़े बड़े काम अपने एनजीओ के लिए हासिल किए। क्यों कि यहां एक बात साफ है, देश के अधिकांश बड़े एनजीओ केवल धन कमाने की गरज से चलाए जा रहे हैं। यह बात एक बार तब फिर से प्रमाणित हुई, जब लाखों प्रवासी मजदूर दर दर की ठोकरें खाते भूखों मरते रहे, तब सरकार से जनसेवा के नाम पर अरबों रूपए पाने वाले ये एनजीओ अधिकांशत: तो नदारद ही बने रहे।

इनके द्वारा सरकारी फंड हासिल करने के लिए सभी प्रकार के सही और गलत रास्ते अपनाए जाने के समाचार भी आए दिन मीडिया के माध्यम से सामने आते रहते हैं। मध्य प्रदेश का हनीट्रेप कांड भी इसी श्रेणी का मामला बताया जाता है। प्राप्त मसौदे के अनुसार उसमें भी पहले उच्च श्रेणी के नौकरशाहों और राजनेताओं को अपने बिस्तर पर आने हुतु प्रलोभित किया गया और जब मछलियां जाल में फंस गई तो उन्हें अपनी अपनी हैसियत के हिसाब से ब्लैक मेल किया जाता रहा।

दुष्कर्म मामले में जांच केवल IAS की ही क्यों

हो सकता है पाठक के मामले में भी ऐसा ही हुआ हो और जब बात बिगड़ गई तो एक पक्ष को महिला होने का लाभ मिल रहा हो, और दूसरा पक्ष पुरूष होने की सजा अकारण ही भुगत रहा हो। अत: आवश्यकता इस बात की है कि जिस प्रकार जांजगीर के पूर्व कलेक्टर पाठक के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। उनके खिलाफ जांच भी शुरू हो गई है। उसी प्रकार शिकायत कर्ता महिला के खिलाफ भी मामला पंजीबद्ध किया जाकर, उसके खिलाफ भी समानांतर जांच शुरू की जानी चाहिए।

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क्योंकि भारतीय संविधान यह स्पष्ट व्यवस्था देता है, यदि कोई भी नौकरशाह, जनप्रतिनिधि अथवा अन्य सक्षम व्यक्ति नाजायज लाभ देने का प्रलोभन देकर हितग्राही से अनुचित लाभ हासिल करता है तो उसे जुर्म माना गया है। उसी प्रकार ये प्रावधान भी स्पष्ट है कि यदि कोई हितग्राही किसी नौकरशाह, जनप्रतिनिधि अथवा अन्य से अनुचित लाभ प्राप्त करने की गरज से उसे प्रलोभन देता है अथवा उसे नाजायज तरीके से कुछ भी प्रदान करता है तो वह भी उतना ही बड़ा अपराध कारित करता है।

यहां एक बात यह भी ध्यान में रखने योग्य है, शिकायत कर्ता किसी भी दृष्टि से कमजोर, गरीब, लाचार, बेबस अथवा लावारिस श्रेणी की नहीं है, जिसे कोई कलेक्टर भी डरा धमका कर आसानी से भयभीत करले और उसकी रजामंदी हासिल किए बगैर मंदमति आदमी की तरह अपने ही शासकीय केबिन में उसके साथ दुष्कर्म जैसा घृणित अपराध कारित कर बैठे।

यहां न तो किसी आईएएस का पक्ष लिया गया है और न ही किसी शिकायत कर्ता को हतोत्साहित करने का पाप ही किया जा रहा है। बस जांच अधिकारियों के सामने एक उचित बात रखने का प्रयास है। यदि मामला अनुचित लाभ के चलते किसी भी प्रकार के नाजायज लेनदेन यानि शारीरिक संबन्ध बनाने का भी है, तो कथित लेने वाले पक्ष के साथ स्वघोषित देने वाले पक्ष को भी दूसरा आरोपी बनाया जाना उचित प्रतीत होता है।

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