चिकित्सकों की लापरवाही से दो जानें खतरे में

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चिकित्सकों की लापरवाही से दो जानें खतरे में . पूरा परिवार संक्रमित

जिसे स्वस्थ बता कर टरकाते रहे वो निकला पॉजिटिव

पूरा परिवार संक्रमित , दो लोग हाई रिस्क श्रेणी के

जबलपुर। यहां पर चिकित्सकों की लापरवाही से दो जानें खतरे में आ गई हैं। चिकित्सक लोग जिसे स्वस्थ बता कर टरकाते रहे वो पॉजिटिव निकला। नतीजा हश्र ये हुआ कि उस पॉजिटिव के संपर्क में आकर उसका पूरा परिवार संक्रमित हो गया। उनमें से भी दो लोग हाई रिस्क श्रेणी को प्राप्त हो चुके हैं। मध्य प्रदेश के जबलपुर महा नगर में सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की लापरवाही की हद हो गयी। मामला दिल्ली से आए 36 वर्षीय एक इंजीनियर का है।

विक्टोरिया अस्पताल में उसका उपचार हो रहा है। प्राप्त जानकारी के अनुसार इंजीनियर को दिल्ली से आने के बाद अगले दिन ही बुखार आ गया था। वह जांच के लिए एक नहीं दो दो बार मेडिकल कॉलेज भी गया। दोनों बार जाने और ट्रेवल हिस्ट्री बताने पर भी डॉक्टरों ने जांच के बाद बुखार नहीं होने की बात कहकर लौटा दिया। लेकिन उसे बुखार बना रहा, इसलिए वह अगले दिन वह विक्टोरिया गया। वहां भी डॉक्टरों ने इंजीनियर को लापरवाही से लेते हुए चलता कर दिया।

परेशान होकर इंजीनियन ने एक समाजसेवी से मदद मांगी। उसके माध्यम से दोबारा विक्टोरिया अस्पताल पहुंचा तो नमूने लेकर घर भेज दिया गया। करीब एक सप्ताह बाद रिपोर्ट आई, तो वह व्यक्ति कोविड-19 पॉजिटिव निकला, जिसे चिकित्सकों द्वारा बार बार स्वस्थ बताया जा रहा था। उससे भी ज्यादा तकलीफ की बात तो ये हुई कि इंजीनियर के सम्पर्क में आकर परिवार के सात सदस्य भी कोरोना संक्रमित हो गए। उनमें हाई रिस्क के दो मरीज भी निकले हैं।

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इन हाई रिस्क संक्रमितों में 61 वर्षीय डायबिटिक और एक साल की बच्ची शामिल है। बता दें 30 मई को फ्लाइट से जबलपुर आए इंजीनियर की नई दिल्ली और डुमना एयरपोर्ट पर थर्मल स्क्रीनिंग हुई। उसके शरीर का तापमान सामान्य पाया गया। फिर भी एक फॉर्म भराया गया। घर जाकर स्वास्थ्य में परेशानी हुई तो अस्पताल जाकर जांच कराने के लिए कहा गया। मिली जानकारी के अनुसार 31 मई को वह मेडिकल और एक जून को विक्टोरिया अस्पताल गया।

वहां पर थर्मल स्कैनर से उसका ट्रैम्प्रेचर लिया गया तो 95-96 प्वाइंट रेकॉर्ड हुआ। दोनों ही बार जब उसने घर जाकर डिजीटल थर्मामीटर से जांच की तो तापमान 100 प्वाइंट-फोरेनहाइट आया। तब उसने एक समाजसेवी की मदद ली और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी के दखल से जांच हुई। तब कहीं जाकर मामला स्पष्ट हुआ। लेकिन तब तक इंजीनियर का पूरा परिवार ही संक्रमित हो चुका है। खतरे की बात ये कि परिवार के दो लोग हाई रिस्क श्रेणी को प्राप्त हो चुके हैं। क्या इन चिकित्सकों को भी कोरोना योद्धा कहा जाना उचित रहेगा?

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